उड़ता पंजाबः समीक्षा पढ़कर जान लीजिए कि आखिर फिल्म है कितनी दमदार?

स्टेटमेंट टुडे न्यूज़ एजेंसी:

निर्माताः एकता कपूर/फैंटम फिल्म्स
निर्देशकः अभिषेक चौबे
सितारेः शाहिद कपूर, आलिया भट्ट, दिलजीत दोसांज, करीना कपूर
रेटिंग *1/2

अफवाहों के बाजार में कुछ भी हिट हो सकता है। एक बेहद खराब फिल्म यहां सफल हो सकती है। एकता कपूर, अनुराग कश्पय और उनकी टीम को सेंसर बोर्ड का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि दोयम फिल्म को उसने समाचारों की हेडलाइंस में दर्ज करा दिया। फिल्म ज्यों की त्यों भी पास कर दी जाती तो भी दर्शक खारिज कर देते। जितनी गालियां फिल्म के किरदार देते हैं, उससे ज्यादा उन्हें और निर्माता-निर्देशक को दर्शकों से मिलती। खैर, अब दरवाजे खुल चुके हैं।

उड़ता पंजाब एक बीमार फिल्म है। लचर और लंगड़ी। पंजाब में ड्रग्स की समस्या की जहां तक बात है, वह यहां डॉक्युड्रामा जैसी लगती है। मुख्य कथा से यह हिस्सा हटकर चलता है। दृश्यों-संवादों में जज्बात गायब हैं। ड्रग्स कैसे बनते हैं, कहां से कैस माल आता है कहां जाता है, इस पर असली जोर है। कहानी को यहां खबर के नजरिये से कहने की कोशिश है जबकि खबरिया चैनल खबरों को कहानी की तरह दिखा टीआरपी पाने के लिए प्रयासरत हैं। उड़ता पंजाब में कहानी-खबर का कॉकटेल असर नहीं छोड़ता। बल्कि लगता है, क्यों वक्त बर्बाद किया? फिल्म धन और मन दोनों की सेहत के लिए हानिकारक है।

यहां मूल कहानी रॉकस्टार टॉमी सिंह (शाहिद कपूर) की है, जो अपने गानों में ड्रग्स का महिमामंडन करता है। उससे प्रेरित युवा नशाखोरी से नष्ट हो रहे हैं। राज्य पुलिस सीमा पार और अन्य जगहों से आ रहे नशे के सामान को बंधी-बंधाई रकम लेकर नाकों से पार कर रही है।

राज्य के नेताओं की छत्रछाया में अवैध व्यवसाय फूल-फल रहा है। ऐसे में पुलिसवाले सरताज सिंह (दिलजीत दोसांज) का छोटा भाई ड्रग्स का शिकार हो जाता है। तब उसकी आत्मा जाग उठती है। वह ड्रग्स के विरुद्ध अभियान और अस्पताल चलाने वाली डॉक्टर (करीना कपूर) के साथ मिल अपराधियों के विरुद्ध सुबूत इकट्ठा करता है। इस सबके बीच एक ट्रेक बिहार से पंजाब के खेतों में काम करने आई युवती (आलिया भट्ट) का है, जो ड्रग्स रैकेट का शिकार बन जाती है!

आधे घंटे में ही फिल्म ऊबा देती है

उड़ता पंजाब डार्क फिल्म है। मगर इसका अंधेरा अपने असर के साथ भीतर नहीं उतर पाता। शुरुआती आधे घंटे के बाद फिल्म चमक खो कर दर्शक को ऊब की तरफ ढकेल देती है। कहानी, स्क्रिप्ट और संवादों में सुराख हैं। यहां से बोरियत की रेत धीरे-धीरे देखने वाले पर झरने लगती है। कहानी का केंद्रीय पात्र टॉमी सिंह जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, मजाक में तब्दील हो जाता है। शाहिद कपूर को यह भूमिका न अभिनय के लिहाज से ऊपर उठाती है और न स्टारडम चमकाती है।

पिछले साल अनुराग कश्यप की टीम द्वारा बनाई ‘शानदार’ ने शाहिद के खाते में जो बड़ी नाकामी लिखी थी, उड़ता पंजाब उसी को दोहराती है। पहले हिस्से में आप शाहिद का इंतजार करते रहते हैं और दूसरे में वह हारे और खीझे हुए इंसान की तरह यहां-वहां भटकते हैं। वह आक्रामक रॉकस्टार से क्रमशः कॉमिक किरदार में बदल जाते हैं। उनके पतन पर दया नहीं, हंसी आती है। फिल्म शाहिद के करिअर के लिए झटका है। आलिया भट्ट बिहारी बोलती हुई बिल्कुल प्रभावित नहीं करतीं। उनके अभिनय का नकलीपन कई दृश्यों में साफ झलकता है। यही स्थिति करीना कपूर की है। ग्लैमर और फिल्मी अदाओं से वह पीछा नहीं छुड़ा पातीं। दिलजीत दोसांज पर्दे पर शाहिद से ज्यादा दिखते हैं परंतु इस रोल में ऐसी बात नहीं कि उन्हें याद रखें।

उड़ता पंजाब का ट्रीटमेंट आर्ट फिल्म जैसा है, जिसे बॉलीवुड सितारों के साथ बनाया गया है। नतीजा यह कि दोहरी कश्मकश में फिल्म कलात्मक आकार तो नहीं ले सकी, सितारों को डूबने का जो नुकसान हुआ सो अलग। निर्देशक अभिषेक चौबे इश्किया (2010) के लिए पहचाने जाते हैं। उड़ता पंजाब में वह पुराने मील के पत्थर से आगे नहीं हैं। फिल्म का क्लाइमेक्स हिंसक और हास्यास्पद है। तीन मिनट में आधा दर्जन लोग गोलियों से मारे जाते हैं!

गंभीर सिनेमा के शौकीनों को भी उड़ता पंजाब से ताल मिलाने में मुश्किल आएगी। फिल्मों से मनोरंजन करने वाले तो इससे दूर ही रहें। यहां गालियों की भरमार है और ड्रग्स लेते हुए किशोर-युवा मौजूद हैं। आप सिर्फ यह देखने के लिए जा सकते हैं कि उड़ता पंजाब में आखिर क्या विवादास्पद था, जो सेंसर बोर्ड को अखरा। अपनी आंखों से देख कर आप पाएंगे कि खोदा पहाड़ निकली चुहिया!!

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