यह अकेलापन कहाँ ले जाएगा हमारे नौनिहालों को

स्टेटमेंट टुडे / समाचार एजेंसी:

अब्दुल बासित/ब्यूरो मुख्यालय: आज बच्चे एकाकी जीवन जी रहे हैं। उनके इस एकाकी जीवन का सहारा केवल कम्प्यूटर, फेसबुक, यूट्यूब, टीवी आदि बन चुके हैं। हम सभी जानते हैं कि यह बच्चों को क्या परोस रहे हैं और क्या दे रहे हैं, साथ ही बच्चों को किस दिशा में ले जा रहे हैं। बच्चे विद्रोही होते जा रहे हैं, क्रोध के शिकार होते जा रहे हैं, हीनभावना व अवसाद के शिकार होते जा रहे हैं, आत्महत्या या दूसरे की हत्या तक के अपराध के जाल में फंसते जा रहे हैं। इतने पर भी हम बुद्धिजीवी व शिक्षित कहे जाने वाले माता-पिता इस गंभीर समस्या से बेखबर अपने-अपने कार्य को प्राथमिकता दे रहे हैं। अभी हाल ही में एक सर्वेक्षण हुआ है, उसमें जो तथ्य उभरकर आए हैं वह बहुत ही चैकाने वाले हैं। यदि तथ्यों पर चिंतन, मनन व मंथन कर कारगर उपाय न उठाए गए तो यह अकेलापन हमारे नौनिहालों को कहाँ ले जाएगा? यह प्रश्न मैं आपके लिए ही छोड़ रहा हूँ। सर्वे के अनुसार जो तथ्य सामने आए हैं, उन्हें भी मैं आपके समक्ष रख रहा हूँ। मेट्रो शहरों में हुए सर्वे के मुताबिक –

  • 50 प्रतिशत माता-पिता पूरे साल में अपने माता-पिता के साथ 30 दिन भी नहीं बिता पाते हैं।
  • 50 प्रतिशत व्यक्ति 3 वर्षों में 1 बार से अधिक अपने परिवार से नहीं मिले हैं।
  • 53 प्रतिशत माता-पिता रिश्तेदारों से दूर हैं। दादा-दादी व नाना-नानी से बच्चे साल भर में 10 दिन भी नहीं मिल पाते हैं।
  • केवल 4 प्रतिशत बच्चों को ही विस्तृत परिवार का सुख मिल पाता है।
  • 89 प्रतिशत लोग मानते हैं कि हम व्वाट्स एप पर ही अपने परिवार से मिल पाते हैं।
  • 40 प्रतिशत बच्चे साल में 10 दिन भी अपने दादा-दादी और नाना-नानी के साथ नहीं रह पाते हैं।
  • 33 प्रतिशत बच्चे अपने चचेरे भाई-बहनों व अन्य रिश्तेदारों के नाम तक नहीं जानते हैं।
  • मामा-मामी, मौसा-मौसी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, बुआ-फूफा आदि रिश्तेदार बच्चों के लिए पहेली बन चुके हैं।
  • 76 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया है कि पिछला त्यौहार हम दो हमारे दो के बीच ही मनाया गया।
  • 33 प्रतिशत युवा भाई-बहन साल में एक दूसरे के पास 10 दिन भी नहीं रह पाते हैं।
  • 7 प्रतिशत युवाओं ने 3 वर्षों में परिवार के साथ एक त्यौहार तक नहीं मनाया।
  • प्राइवेट कंपनी के कर्मचारियों का तो और भी बुरा हाल है। दादा-दादी, नाना-नानी की तो बात छोड़िए, 25 प्रतिशत 3 साल में भी 1 दिन भी अपने बच्चों के साथ वेकेशन पर नहीं गए।
  • 76 प्रतिशत लोगों को अपने कार्यालय या व्यापार की व्यस्तता के कारण हॉलिडे कैंसिल करना पड़ता है।
  • 90 प्रतिशत लोग संयुक्त परिवार से अलग रहते हैं। उनके लिए परिवार की परिभाषा ‘हम दो हमारे दो’ बनकर ही रह गए हैं।
  • 90 प्रतिशत लोग को ‘हम दो हमारे दो’ को परिवार मानने वाले भी अपने बच्चों को किन्ही कारणों से पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे हैं।
  • 53 प्रतिशत लोग खुले मन से स्वीकार करते हैं कि हम काम के दबाव में अपने नौनिहालों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते हैं।

यदि सर्वे के इन तथ्यों पर विचार करें तो तस्वीर बिल्कुल साफ नजर आ रही है कि हमारी व्यस्तता, दिन-रात का परिश्रम, किसके लिए? तो तस्वीर बोलती है – बच्चों के लिए, अपने लिए, माता-पिता के लिए, परिवार के लिए! तो फिर क्या हम तस्वीर की बात सुन रहे हैं? उत्तर है – कदापि नहीं! बस दौड़े ही चले जा रहे हैं। कहाँ जाना है, पता नहीं। जिसके लिए आप काम कर रहे हैं, उन्हीं के साथ अन्याय कर रहे हैं। तो रुकिए! इस अंधी दौड़ को आँख खोलकर देखिए, चिंतन मनन मंथन करिए, फिर आगे बढ़िये। यह मेरी आवाज नहीं, अपितु आपके बच्चों व आपके माता-पिता की आवाज है

(हरि ओम शर्मा ‘हरि’)

3 comments

  • frolpwecerit

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