क्या मुख़्तार बंधू बसपा की उ० प्र ० चुनाव में नैया पार लगायगे ?

statementtoday.com7 years ago192 min
स्टेटमेंट टुडे न्यूज़ एजेंसी:
97 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर समुदाय के वोट बैंक को अपने पाले में करने की इच्छा रखने वालीं मायावती ने अंसारी बंधुओं पर बड़ा दांव खेला है

बीते दिनों मउ में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि उत्तर प्रदेश की जेलें अपराधियों और बाहुबलियों के लिए ऐशगाह बन गई हैं. उन्होंने सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर आरोप लगाया कि उनकी शह पर बाहुबलियों को जेल में इतनी सुविधाएं दी जाती हैं कि वे वहीं से अपना गैंग चला लेते हैं.

जो लोग पूर्वांचल की राजनीति को समझते हैं, उनका मानना है कि प्रधानमंत्री भले ही अखिलेश यादव पर हमला कर रहे थे लेकिन उनके निशाने पर मुख्तार अंसारी थे. मुख्तार अंसारी मउ सीट से ही बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं. प्रधानमंत्री ने जिस दिन मुख्तार पर हमला बोला उसके अगले दिन ही बसपा प्रमुख मायावती उनके बचाव में उतर गईं. मउ की ही एक सभा में उन्होंने कहा कि असली बाहुबली तो समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के पाले में हैं. उन्होंने मुख्तार का बचाव करते हुए लोगों से उनके पक्ष में मतदान करने की अपील की.

भले ही मुख्तार अंसारी पिछले 12 सालों से जेल में हैं, लेकिन माना जाता है कि पूर्वांचल के कुछ जिलों में मुस्लिम समाज के लोगों पर उनका प्रभाव है

मुख्तार अंसारी के भाई सिब्गतुल्ला अंसारी गाजीपुर की मुहम्मदाबाद सीट से बसपा के टिकट पर मैदान में हैं. मुख्तार के साथ अक्सर चर्चा में रहे उनके भाई अफजाल अंसारी बसपा के स्टार प्रचारक हैं. पार्टी उनकी सभाएं मुस्लिमों के प्रभाव वाली सीटों पर करा रही है. बसपा उम्मीदवार के तौर पर ही मुख्तार के बेटे अब्बास अंसारी मउ की ही घोसी सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. मायावती जिस चुनावी सभा में मुख्तार का बचाव कर रही थीं, उस सभा में मंच पर अब्बास अंसारी भी थे.

भले ही मुख्तार अंसारी पिछले 12 सालों से जेल में हैं, लेकिन माना जाता है कि पूर्वांचल के कुछ जिलों में मुस्लिम समाज के लोगों पर उनका प्रभाव है. बसपा में शामिल होने से पहले वे और उनके भाई समाजवादी पार्टी के साथ होने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे. लेकिन अखिलेश यादव के विरोध के चलते ऐसा नहीं हो पाया. अंसारी बंधुओं के कौमी एकता दल के सपा में विलय की घोषणा तक हो गई थी. लेकिन अखिलेश अड़ गए और सपा के आंतरिक संघर्ष के बाद भी अंसारी बंधुओं की सपा में दाल नहीं गल पाई. ऐसे में एकदम आखिरी वक्त में अंसारी बंधुओं को बसपा की शरण मिली. 97 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर मुस्लिम वोट बैंक को अपने पाले में करने की इच्छा रखने वाली मायावती को लगा कि अंसारी बंधुओं के बसपा के पाले में आ जाने से पूर्वांचल में पार्टी को लाभ हो सकता है.

लेकिन क्या ऐसा होगा? वाराणसी और अंसारी बंधुओं का गढ़ माने जाने वाले गाजीपुर के लोगों से बातचीत करने के बाद संकेत मिलता है कि इस बार के चुनाव में अंसारी बंधु उतने मजबूत नहीं हैं जितने पहले हुआ करते थे. गाजीपुर के शिवशंकर कुशवाहा कहते हैं, ‘बसपा ने इन्हें अपनी पार्टी में शामिल कराके गलती की है. अगर इन्हें बसपा अपने साथ नहीं लाती तो ये खत्म हो जाते. लेकिन बसपा के साथ आ जाने से इनकी राजनीतिक ताकत बनी हुई है और शायद आगे भी बनी रहे. बसपा को इनसे फायदा हो या नहीं हो लेकिन अंसारी बंधुओं को बसपा में शामिल होने का फायदा जरूर मिल रहा है.’

पूर्वांचल में अंसारी बंधुओं के प्रभाव के बारे में पूछे जाने पर लंबे समय से इस क्षेत्र की राजनीति को कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार दीनबंधु राय कहते हैं, ‘यह एक सच्चाई है कि अंसारी बंधुओं का पूर्वांचल के मुस्लिम समाज के लोगों पर प्रभाव है. लेकिन यह भी सच है कि अब यह पकड़ ढीली पड़ती जा रही है. हालांकि यह इतनी ढीली अब भी नहीं हुई कि कहा जा सके कि पूर्वांचल का मुस्लिम मतदाता अब उनकी सुनेगा ही नहीं.’

भाजपा नेता निजी बातचीत में कई आंकड़ों और तर्कों के साथ यह दावा कर रहे हैं कि खुद अंसारी बंधुओं का चुनाव जीतना मुश्किल है.

तो क्या बसपा को अंसारी बंधुओं की मौजूदगी से कोई फायदा मिलेगा? राय कहते हैं, ‘कम से कम जिन सीटों पर अंसारी परिवार के लोग लड़ रहे हैं, उन पर तो यह तकरीबन तय है कि मुस्लिम मतदाता बसपा के पक्ष में ही गोलबंद होंगे. अन्य छिटपुट सीटों पर भी इनकी मौजूदगी का आंशिक असर पड़ेगा. लेकिन यह असर इतना नहीं दिख रहा है कि चुनाव परिणाम को बसपा के पक्ष में कर दे.’

दरअसल, पूर्वांचल के लोगों से बातचीत से यह भी पता चलता है कि इस बार इस क्षेत्र में पूरा का पूरा मुस्लिम वोट किसी एक पार्टी के पक्ष में नहीं जाता दिख रहा. बल्कि जिस सीट पर सपा का उम्मीदवार मजबूत है, वहां उम्मीद की जा रही है कि मुस्लिम मतदाता सपा के पक्ष में रहेंगे और जहां बसपा का उम्मीदवार मजबूत है, वहां बसपा के पक्ष में.

जानकार बता रहे हैं कि इस वजह से अंसारी बंधुओं का प्रभाव इस बार पूर्वांचल में कम दिख रहा है. यह भी कहा जा रहा है कि अगर सपा बंट गई होती और मुलायम सिंह यादव की सपा और अखिलेश यादव की सपा अलग-अलग चुनाव लड़ रही होती तो ऐसी स्थिति में अंसारी बंधु बसपा के पक्ष में मुस्लिम मतदाताओं को गोलबंद करने में ज्यादा कामयाब होते.

हालांकि, भाजपा नेता निजी बातचीत में कई आंकड़ों और तर्कों के साथ यह दावा कर रहे हैं कि खुद अंसारी बंधुओं का चुनाव जीतना मुश्किल है. उनके मुताबिक सिब्गतुल्ला अंसारी के लिए गाजीपुर की मुहम्मदाबाद सीट निकालना इस बार बेहद मुश्किल है. भाजपा नेताओं का दावा है कि जिस तरह से उनकी पार्टी ने इस बार गैर यादव और गैर हरिजन पिछड़ी जातियों को अपने पक्ष में गोलबंद किया है, उसकी वजह से मुहम्मदाबाद की सीट अंसारी परिवार के पास नहीं जा पाएगी.

कुल मिलाकर अंसारी बंधुओं से बसपा को कोई नफा हो या नहीं, लेकिन यह साफ दिख रहा है कि पूर्वांचल में विधानसभा चुनावों में वे अब भी एक बड़ा मुद्दा बने हुए हैं.

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